देहरादून।
उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का सबसे बड़ा हथियार माने जाने वाला लोकायुक्त पद लंबे समय से खाली पड़ा है, जिसका असर अब साफ तौर पर देखने को मिल रहा है। राज्य में करीब 1732 भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतें लंबित पड़ी हैं, जो लोकायुक्त की नियुक्ति के अभाव में आगे नहीं बढ़ पा रही हैं।
सूत्रों के अनुसार, ये शिकायतें विभिन्न विभागों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से जुड़ी हैं, लेकिन जांच और निस्तारण की प्रक्रिया ठप पड़ी है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब शिकायतें दर्ज हो रही हैं, तो उन पर कार्रवाई कौन करेगा?
दरअसल, लोकायुक्त एक स्वतंत्र संस्था होती है, जिसे सरकार के मंत्रियों, अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच का अधिकार होता है। �
लेकिन उत्तराखंड में लंबे समय से इस पद पर नियुक्ति नहीं होने के कारण यह पूरा सिस्टम प्रभावित हो रहा है।
हाल ही में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी इस देरी पर नाराजगी जताई है और सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने साफ कहा कि बार-बार निर्देशों के बावजूद लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं होना गंभीर मामला है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकायुक्त न होने से भ्रष्टाचार के मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों प्रभावित हो रही हैं। वहीं विपक्ष भी लगातार सरकार पर भ्रष्टाचार के मामलों को दबाने और कार्रवाई में देरी करने के आरोप लगा रहा है।
आंकड़ों के अनुसार, राज्य में पहले भी हजारों शिकायतें लोकायुक्त और विजिलेंस तंत्र के पास पहुंचती रही हैं, जिससे यह साफ होता है कि जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाती रही
सिस्टम पर बड़ा सवाल
1732 शिकायतों का लंबित होना सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। यदि समय पर लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं होती है, तो यह लंबित मामलों का आंकड़ा और बढ़ सकता है।
आगे क्या?
अब सभी की नजर राज्य सरकार के अगले कदम पर है। क्या जल्द लोकायुक्त की नियुक्ति होगी और इन शिकायतों पर कार्रवाई शुरू होगी, या फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई यूं ही अधर में लटकी रहेगी — यह आने वाला समय तय करेगा












