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जनगणना नहीं, अस्तित्व का सवाल: ‘अपनी गणना अपने गाँव’ अभियान को देहरादून से मिली नई धार

देहरादून स्थित उत्तरांचल प्रेस क्लब में शनिवार को “अपनी गणना अपने गाँव” अभियान के तहत एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें आगामी जनगणना–2027, पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से घटती जनसंख्या और उसके राजनीतिक व विकासात्मक प्रभावों पर गंभीर मंथन किया गया।

बैठक में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि जनगणना केवल आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के भविष्य, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संतुलित विकास से जुड़ा एक संवेदनशील मुद्दा है। प्रतिभागियों ने ग्रामीण स्तर पर व्यापक जागरूकता अभियान चलाने, प्रवासी उत्तराखंडियों को जोड़ने और इसे जनआंदोलन का रूप देने पर जोर दिया। चर्चा के दौरान यह तथ्य सामने आया कि जनगणना के आधार पर ही पंचायतों, नगर निकायों और जिलों के बजट का निर्धारण होता है, साथ ही लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के परिसीमन की प्रक्रिया भी इसी पर निर्भर करती है। ऐसे में लगातार हो रहा पलायन पर्वतीय क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को भविष्य में कमजोर कर सकता है। बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, यदि परिसीमन 2027 की संभावित जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो 9 पर्वतीय जिलों की विधानसभा सीटें घटकर लगभग 39 रह सकती हैं, जबकि 4 मैदानी जिलों की सीटें बढ़कर 66 तक पहुंच सकती हैं। इसे राज्य निर्माण के मूल उद्देश्यों के विपरीत बताया गया। वक्ताओं ने पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2020 तक लगभग 4 लाख प्रवासी अस्थायी रूप से अपने गांव लौटे थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रवासी समाज आज भी अपने मूल गांवों से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। सही रणनीति के साथ जनगणना के दौरान 5 से 6 लाख लोगों की गांवों में उपस्थिति सुनिश्चित कर पर्वतीय जिलों की जनसंख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। बैठक की अध्यक्षता डॉ. आर.पी. रातूड़ी ने की। प्रमुख रूप से उपस्थित लोगों में जोत सिंह बिष्ट (संयोजक), मथुरा दत्त जोशी, एस.एस. नेगी, अजय राणा, जयसिंह रावत, विजेंद्र सिंह रावत, नरेंद्र सिंह नेगी, सौरव मैठाणी, दीपक कैन्तुरा सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे। बैठक में एक संयोजक मंडल का गठन भी किया गया, जो आगामी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और अभियान को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए रणनीति तैयार करेगा। अंत में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उत्तराखंड के भविष्य और पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर है, जिसके लिए समन्वित और ठोस प्रयास जरूरी हैं।

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