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Bhuvan Chandra Khanduri नहीं रहे: फौज की वर्दी से उत्तराखंड की सत्ता तक, एक ईमानदार दौर का अंत

देहरादून |
उत्तराखंड की राजनीति के लिए बुधवार का दिन बेहद दुखद साबित हुआ। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता Bhuvan Chandra Khanduri का निधन हो गया। उन्होंने देहरादून के अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई।
खंडूरी सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, बल्कि साफ-सुथरी छवि, अनुशासन और ईमानदारी की मिसाल माने जाते थे। सेना से लेकर राजनीति तक उनका सफर सेवा, सादगी और कठोर कार्यशैली के लिए हमेशा याद किया जाएगा।
फौज की वर्दी से राजनीति तक का सफर
1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे भुवन चंद्र खंडूरी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय, कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग पुणे, इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स दिल्ली और इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट सिकंदराबाद से उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1954 से 1990 तक उन्होंने भारतीय सेना के कोर ऑफ इंजीनियर्स में सेवा दी। लगभग 36 वर्षों के सैन्य जीवन में उन्होंने कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेना में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें वर्ष 1982 में राष्ट्रपति द्वारा ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल (AVSM)’ से सम्मानित किया गया। फौज में सीखा अनुशासन और सादगी ही बाद में उनकी राजनीतिक पहचान बना। राम मंदिर आंदोलन से राजनीति में एंट्री 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा। 1991 में पहली बार गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद 1998, 1999 और 2004 में भी लगातार जीत हासिल कर उन्होंने गढ़वाल की जनता का भरोसा कायम रखा। वाजपेयी सरकार में निभाई बड़ी भूमिका पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee की सरकार में भुवन चंद्र खंडूरी सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में राज्यमंत्री और बाद में कैबिनेट मंत्री बने। उनके कार्यकाल में देश में सड़क विकास की कई ऐतिहासिक परियोजनाएं शुरू हुईं। ‘गोल्डन क्वाड्रिलेटरल’ जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका रही। देश के चार बड़े महानगरों को जोड़ने वाली इस परियोजना ने भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर को नई दिशा दी।
दो बार बने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री वर्ष 2007 में भाजपा की जीत के बाद खंडूरी पहली बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने वीआईपी संस्कृति पर रोक लगाने की दिशा में कई फैसले लिए। नेताओं और अफसरों की सुरक्षा कम करना, विदेश यात्राओं में खर्च पर नियंत्रण और मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष के उपयोग में पारदर्शिता जैसे कदम उनकी कार्यशैली को दर्शाते थे। हालांकि 2009 लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। इसके बाद 11 सितंबर 2011 को उन्होंने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस दौरान उन्होंने मजबूत लोकायुक्त कानून लागू करने की दिशा में काम किया, लेकिन 2012 विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत नहीं मिला और उन्हें पद छोड़ना पड़ा। बेटी ने संभाली राजनीतिक विरासत भुवन चंद्र खंडूरी की बेटी Ritu Khanduri Bhushan वर्तमान में उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष हैं। वह उत्तराखंड की पहली महिला विधानसभा अध्यक्ष बनीं। पिता के निधन पर विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर से शोक संदेश जारी किया गया। प्रदेशभर में शोक खंडूरी के निधन पर राजनीतिक, सामाजिक और विभिन्न संगठनों से जुड़े लोगों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। भाजपा सहित तमाम दलों के नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। 91 वर्ष की उम्र में भुवन चंद्र खंडूरी ने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी सादगी, ईमानदारी और अनुशासन की पहचान हमेशा उत्तराखंड की राजनीति में मिसाल बनकर जीवित रहेगी।

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