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हिमालयी संसाधनों पर गहराया संकट, संरक्षण और सुशासन को लेकर दून विश्वविद्यालय में मंथन

देहरादून, 2 जून 2026

दून विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित “हिमालयी एक्शन स्कूल” कार्यक्रम के दूसरे दिन हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, सुशासन, रोजगार, पलायन, महिलाओं की स्थिति और जलवायु परिवर्तन जैसे अहम मुद्दों पर गंभीर मंथन हुआ। कार्यक्रम में देश-विदेश से पहुंचे विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रतिनिधियों ने हिमालयी राज्यों के सामने खड़ी चुनौतियों और उनके संभावित समाधानों पर विस्तार से चर्चा की।

नागालैंड से आए डॉ. अंबा जमीर ने कहा कि पहले उनके राज्य में प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसले समुदाय आधारित व्यवस्था के तहत लिए जाते थे और स्थानीय लोगों को संसाधनों पर मूल अधिकार प्राप्त थे। लेकिन वर्तमान समय में यह परंपरागत व्यवस्था कमजोर होती जा रही है, जिससे स्थानीय समुदायों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।

नेपाल की पूर्व विदेश मंत्री डॉ. विमला राय पौड़ियाल ने कहा कि नेपाल में आज भी प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उपयोग के लिए पारंपरिक नियम-कानून लागू हैं, लेकिन बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के कारण इन व्यवस्थाओं में बदलाव देखने को मिल रहा है, जो भविष्य में नए संकट पैदा कर सकता है।

दून विश्वविद्यालय में गूंजा हिमालय का मुद्दा, संरक्षण और सुशासन पर मंथन

आईएमआई से सेवानिवृत्त डॉ. रमेश नेगी ने आजादी के बाद की शासन व्यवस्था और वर्तमान नीतियों की तुलना करते हुए कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय की विकास संबंधी सोच और आज की व्यवस्था में बड़ा बदलाव आ गया है। उन्होंने कहा कि बढ़ते निजीकरण के कारण प्राकृतिक संसाधनों को अब सार्वजनिक हित के बजाय निजी लाभ के नजरिए से देखा जाने लगा है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में पर्याप्त बजट उपलब्ध होने के बावजूद उसका प्रभावी और योजनाबद्ध उपयोग नहीं हो पा रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों के अध्येता डॉ. जीत सिंह सनवाल ने उत्तराखंड की वन पंचायतों की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि जिन वन पंचायतों को पहले व्यापक अधिकार प्राप्त थे, वे अब धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। इससे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को बढ़ावा मिला है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रेम बहुखंडी ने कहा कि उत्तराखंड की वन पंचायतों को सत्ता प्रतिष्ठानों ने अपनी बपौती समझ लिया है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर उत्तराखंड सहित अधिकांश हिमालयी राज्यों में तेजी से देखने को मिल रहा है। उनके अनुसार प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए स्थानीय परंपराओं, सामाजिक व्यवस्थाओं और जनभागीदारी को मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्होंने विकास के असमान भौगोलिक वितरण पर भी चिंता जताई और इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को जिम्मेदार बताया।

कार्यक्रम में श्रमयोग के अध्यक्ष डॉ. अजय जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता विद्याभूषण रावत, कुलदीप वर्मा, मोहम्मद मीर हमजा, रेनू ठाकुर, तरुण जोशी, सोनी शबनम, डॉ. शिवानी पांडे और डॉ. सालमन खुर्शीद सहित विभिन्न हिमालयी राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न हो रहे खतरों और चुनौतियों पर अपने विचार रखे।

वक्ताओं ने हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर जोर देते हुए सतत विकास की दिशा में ठोस प्रयासों की आवश्यकता बताई।

हिमालयी भविष्य पर मंथन, दून विश्वविद्यालय में जुटे विशेषज्ञ

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