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शहीदों के सम्मान में धामी कैबिनेट का बड़ा फैसला, पैतृक गांवों में स्थापित होंगी वीर सपूतों की प्रतिमाएं

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की गौरवशाली सैन्य परंपरा और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सैनिकों के सम्मान में धामी सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में प्रदेश के शहीद सैनिकों की प्रतिमाएं उनके पैतृक गांवों में स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है।

सरकार की इस पहल का उद्देश्य शहीद सैनिकों की वीरता, त्याग और बलिदान की स्मृतियों को उनके गांवों में स्थायी रूप से जीवंत रखना है। अब जिन गांवों ने अपने किसी वीर सपूत को देश की रक्षा के लिए खोया है, वहां उनकी प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र बनेगी।

गांव की मिट्टी में जीवंत रहेगी शहादत

उत्तराखंड को देश की सैन्य परंपरा के लिए विशेष पहचान हासिल है। प्रदेश के बड़ी संख्या में युवा भारतीय सेना में सेवा देते हैं और कई वीर जवान देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं। सरकार के इस फैसले से शहीदों की याद सिर्फ किसी बड़े युद्ध स्मारक तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उनके अपने गांव में भी उनकी वीरगाथा को सम्मान मिलेगा।

प्रतिमा के माध्यम से स्थानीय लोगों, बच्चों और युवाओं को अपने गांव के उस वीर सपूत के जीवन और बलिदान से जुड़ने का अवसर मिलेगा, जिसने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।

नई पीढ़ी को मिलेगी देशसेवा की प्रेरणा

सरकार का मानना है कि शहीदों की प्रतिमाएं युवाओं में राष्ट्रभक्ति और देशसेवा की भावना को मजबूत करने का माध्यम बनेंगी। गांव में अपने ही बीच के अमर शहीद की प्रतिमा देखकर युवा उनके साहस और त्याग से प्रेरणा ले सकेंगे।

यह पहल खास तौर पर उत्तराखंड जैसे सैन्य बाहुल्य राज्य में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां सेना में जाने की परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है।

1,845 शहीदों का सम्मान

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कैबिनेट के इस फैसले को वीरभूमि उत्तराखंड के लिए ऐतिहासिक बताया है। उनके अनुसार प्रदेश के 1,845 शहीद सैनिकों की प्रतिमाएं उनके पैतृक गांवों में स्थापित की जाएंगी। उन्होंने कहा कि यह फैसला शहीदों की वीरता और बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करेगा।

बताए गए आंकड़ों के अनुसार अल्मोड़ा के 141, बागेश्वर के 113, चमोली के 260, चंपावत के 4, देहरादून के 216, हरिद्वार के 15, लैंसडाउन के 212, पौड़ी के 145, नैनीताल के 113, पिथौरागढ़ के 342, रुद्रप्रयाग के 96, ऊधमसिंह नगर के 61 और उत्तरकाशी के 14 शहीदों के नाम इस सूची में बताए गए हैं।

सैनिक परिवारों के सम्मान की दिशा में अहम कदम

धामी सरकार के इस फैसले को सैनिकों और उनके परिवारों के सम्मान से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार पहले भी शहीदों की स्मृति को संरक्षित करने के लिए सैन्य धाम जैसी पहल पर काम कर रही है। मुख्यमंत्री ने कारगिल विजय दिवस के अवसर पर भी कहा था कि शहीदों के घरों से लाई गई पवित्र मिट्टी से निर्मित सैन्य धाम आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रभक्ति, त्याग और बलिदान का प्रेरणा स्थल बनेगा।

अब पैतृक गांवों में शहीद सैनिकों की प्रतिमाएं स्थापित होने से यह सम्मान उनके अपने गांव और समाज तक पहुंचेगा।

सिर्फ प्रतिमा नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा

शहीद सैनिकों की प्रतिमाएं केवल पत्थर या धातु की संरचना नहीं होंगी, बल्कि वे उन वीरों की याद और उनके बलिदान की कहानी को जीवंत रखने का माध्यम बनेंगी। गांव की चौपालों और सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित ये प्रतिमाएं युवाओं को यह संदेश देंगी कि राष्ट्र की सेवा और देश की रक्षा के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता।

उत्तराखंड की वीरभूमि में अब हर गांव अपने अमर सपूतों की वीरगाथा को गर्व के साथ संजोएगा और आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान से देशभक्ति और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा ले सकेंगी।

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